17-18 जुलाई की मिडनाइट रेड में खुलीं थीं अस्पताल की परतें, कार्रवाई के बाद भी नहीं बदले हालात; सरकार के 'बेहतर इलाज और रेफरल कम करने' के दावों पर उठे सवाल लखीसराय। बिहार सरकार लगातार सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने, मरीजों को स्थानीय स्तर पर इलाज देने और अनावश्यक रेफरल पर रोक लगाने के दावे कर रही है। स्वास्थ्य विभाग का जोर इस बात पर है कि मरीजों को जिला और अनुमंडलीय अस्पतालों में ही बेहतर इलाज मिले, ताकि उन्हें दूसरे अस्पतालों का रुख न करना पड़े। लेकिन लखीसराय के बड़हिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की तस्वीर इन दावों के बिल्कुल उलट नजर आ रही है। यहां सवाल सिर्फ रेफरल का नहीं है, बल्कि उससे पहले का है। जब अस्पताल में डॉक्टर ही मौजूद नहीं होंगे तो मरीज का इलाज कौन करेगा और जरूरत पड़ने पर उसे रेफर कौन करेगा? ऐसे में गंभीर मरीजों और उनके परिजनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि आखिर वे करें तो क्या करें। बड़हिया CHC की बदहाल व्यवस्था पर 17 और 18 जुलाई की रात डीएम सह जिला स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष शैलेंद्र कुमार की मिडनाइट रेड ने कई गंभीर सवाल खड़े किए थे। निरीक्षण में करोड़ों रुपये की लागत से बना नया अस्पताल भवन बंद मिला, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी मुख्यालय से अनुपस्थित पाए गए, नियमित MBBS चिकित्सक ड्यूटी से गायब मिले और फर्जी रोस्टर के आधार पर आयुष चिकित्सकों से अस्पताल का संचालन कराया जाता मिला। इन अनियमितताओं के बाद डीएम ने अनुपस्थित चिकित्सकों से जवाब-तलब, वेतन रोकने, प्रभारी को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने, CCTV और बायोमेट्रिक प्रणाली लगाने सहित कई कड़े निर्देश जारी किए।
कार्रवाई के दो दिन बाद भी वही हाल
डीएम की सख्ती के बावजूद अस्पताल की व्यवस्था में सुधार के दावे धरातल पर नहीं दिख रहे हैं। कार्रवाई के महज दो दिन बाद ही डॉक्टरों की अनुपस्थिति का नया मामला सामने आ गया। 20 जुलाई को दोपहर 2:54 बजे वार्ड संख्या-12 निवासी सोनू कुमार, पिता रविंद्र सिंह, इलाज के लिए बड़हिया CHC पहुंचे। आरोप है कि उस समय अस्पताल में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। इसके बाद उनके प्रिस्क्रिप्शन पर साफ शब्दों में लिखा गया—"अभी बड़हिया CHC में कोई डॉक्टर नहीं है।" इस टिप्पणी के नीचे अस्पताल कर्मी सुबोध कुमार एवं राजू कुमार के हस्ताक्षर हैं। वहीं "बड़हिया की जनता" के नाम से 14 स्थानीय लोगों ने भी हस्ताक्षर कर इस दावे का समर्थन किया। बाद में लोगों ने इसी प्रिस्क्रिप्शन को डीएम को सौंपकर कार्रवाई की मांग की।

21 जुलाई की सुबह भी डॉक्टर नहीं मिलने का दावा
स्थिति यहीं नहीं रुकी। 21 जुलाई की सुबह करीब 8:30 बजे इलाज के लिए पहुंचे मरीजों ने बताया कि अस्पताल में उस समय भी कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। मरीजों का कहना है कि उन्हें इलाज के लिए इंतजार करना पड़ा, लेकिन कोई चिकित्सक उपलब्ध नहीं हुआ। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब डीएम स्वयं अस्पताल का निरीक्षण कर चुके हैं, कार्रवाई के आदेश जारी हो चुके हैं और रोजाना निगरानी के निर्देश दिए गए हैं, तब भी यदि मरीजों को डॉक्टर नहीं मिल रहे हैं तो यह बेहद चिंताजनक है।
मिडनाइट रेड में क्या-क्या मिला था?
17 जुलाई की रात डीएम शैलेंद्र कुमार ने अधिकारियों की टीम के साथ अस्पताल का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान करोड़ों रुपये की लागत से बना नया अस्पताल भवन बंद मिला, जबकि पूर्व में सभी सेवाओं को वहां स्थानांतरित करने का निर्देश दिया जा चुका था। निरीक्षण के समय प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी अनुपस्थित थे। रोस्टर में जिन MBBS चिकित्सकों की ड्यूटी दर्ज थी, वे अस्पताल में नहीं मिले। जांच के दौरान RBSK के आयुष चिकित्सक डॉ. आशुतोष प्रताप अस्पताल में कार्य करते मिले, लेकिन रोस्टर में उनका नाम दर्ज नहीं था। दूसरी ओर, जिन चिकित्सकों के नाम रोस्टर में थे, वे अनुपस्थित पाए गए। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि डॉ. मनीष कुमार साहू के विरमित होने के बाद भी उनका नाम ड्यूटी रोस्टर में बना हुआ था। 18 जुलाई की रात दोबारा निरीक्षण में नया भवन तो चालू मिला, लेकिन नियमित MBBS चिकित्सक फिर भी नहीं मिले। अस्पताल मुख्य रूप से आयुष चिकित्सकों और इमरजेंसी स्टाफ के भरोसे संचालित होता मिला।
DM ने दिए थे कई कड़े निर्देश
निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर डीएम ने अनुपस्थित चिकित्सकों से स्पष्टीकरण मांगने, अंतिम निर्णय तक उनका वेतन रोकने, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने, अस्पताल में CCTV कैमरे एवं बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लगाने, दवा वितरण केंद्र चालू कराने, रोस्टर सार्वजनिक करने तथा सिविल सर्जन को प्रतिदिन अस्पताल की निगरानी करने का निर्देश दिया था।
सबसे बड़ा सवाल—इलाज भी नहीं, रेफर भी कौन करेगा?
बिहार सरकार का लक्ष्य है कि सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज उपलब्ध हो और मरीजों को अनावश्यक रूप से रेफर न करना पड़े। लेकिन बड़हिया CHC की मौजूदा स्थिति इस दावे पर सवाल खड़े कर रही है। जब अस्पताल में डॉक्टर ही मौजूद नहीं होंगे, तो मरीज का प्राथमिक उपचार कौन करेगा? उसकी गंभीर स्थिति का आकलन कौन करेगा? और यदि रेफर करना जरूरी हो, तो रेफर कौन करेगा? ऐसी स्थिति में मरीजों और उनके परिजनों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है। कई बार समय पर चिकित्सकीय सलाह नहीं मिलने से गंभीर मरीजों की जान तक जोखिम में पड़ सकती है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि डीएम की मिडनाइट रेड, कार्रवाई के आदेश और मरीजों की नई शिकायतों के बाद स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या ठोस कदम उठाता है और बड़हिया CHC में आम लोगों को नियमित चिकित्सकीय सुविधा आखिर कब तक सुनिश्चित हो पाती है।






