लखीसराय। श्रावण का महीना आते ही पूरा श्रावणी पथ "बोल बम" और "हर-हर महादेव" के जयघोष से गूंज उठा है। हजारों शिवभक्त अजगैवीनाथ धाम, सुल्तानगंज से पवित्र गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथधाम की ओर बढ़ रहे हैं। कोई नंगे पांव चल रहा है, कोई डाक कांवड़ लेकर दौड़ रहा है, तो कोई कठिन व्रत और तपस्या के साथ अपनी श्रद्धा व्यक्त कर रहा है। लेकिन इन्हीं लाखों श्रद्धालुओं के बीच लखीसराय जिले के एक शिवभक्त अपनी अनूठी साधना से हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं। पिपरिया प्रखंड के रामचंद्रपुर पंचायत के उपमुखिया सुबोध कुमार इस बार घुटनों के बल बाबा बैद्यनाथधाम जाने का कठिन संकल्प लेकर निकले हैं। हर कदम पर असहनीय पीड़ा है, सड़क की तपिश है, पथरीले रास्ते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर न दर्द की शिकन है और न ही थकान। उनकी आंखों में सिर्फ एक ही लक्ष्य है—बाबा बैद्यनाथ के दरबार में पहुंचकर जलाभिषेक करना।


आस्था उनके लिए नई नहीं, आठ बार कर चुके हैं दंडवत यात्रा
सुबोध कुमार की यह पहली कठिन धार्मिक यात्रा नहीं है। इससे पहले वे आठ बार सुल्तानगंज से बाबाधाम तक दंडवत प्रणाम करते हुए अपनी यात्रा पूरी कर चुके हैं। हर बार उन्होंने अपनी श्रद्धा और संकल्प से लोगों को प्रेरित किया है। लेकिन इस बार उन्होंने भक्ति की एक और कठिन राह चुनी है-घुटनों के बल बाबा बैद्यनाथधाम पहुंचने का संकल्प। उनकी इस तपस्या को देखकर हर कोई उनकी अटूट आस्था की सराहना कर रहा है। घुटनों के नीचे फोम रखकर साथी निभा रहे सेवा का धर्म यह यात्रा केवल सुबोध कुमार की नहीं, बल्कि उनके साथ चल रहे दो साथियों की सेवा भावना की भी मिसाल है। जैसे ही सुबोध कुमार घुटनों के बल आगे बढ़ते हैं, उनके साथी तुरंत उनके घुटनों के नीचे फोम रख देते हैं ताकि लगातार रगड़ से घुटने अधिक घायल न हों। वे भोजन, पानी और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं का भी पूरा ध्यान रख रहे हैं। श्रावणी पथ पर यह दृश्य देखने वालों की आंखें नम कर देता है।
श्रावणी पथ पर ठहर जाते हैं श्रद्धालु
सुबोध कुमार की तपस्या देखकर राह से गुजरने वाले कांवड़िए और श्रद्धालु कुछ पल के लिए रुक जाते हैं। कई लोग हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करते हैं, तो कई "बोल बम" और "हर-हर महादेव" का उद्घोष कर उनका उत्साह बढ़ाते हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि आज के समय में ऐसी कठिन साधना बहुत कम देखने को मिलती है। बाबा पर अटूट विश्वास सुबोध कुमार का कहना है कि यह यात्रा केवल शरीर की नहीं, बल्कि विश्वास, धैर्य और भक्ति की परीक्षा है। उन्हें पूरा भरोसा है कि बाबा बैद्यनाथ की कृपा से उनका संकल्प अवश्य पूरा होगा और वे सफलतापूर्वक जलाभिषेक कर लौटेंगे। श्रावणी मेला 2026 के पहले ही दिन सुबोध कुमार की यह अनूठी कांवड़ यात्रा पूरे श्रावणी पथ पर चर्चा का विषय बनी हुई है। उनकी तपस्या यह संदेश देती है कि भक्ति केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं होती, बल्कि त्याग, सेवा, धैर्य और अटूट विश्वास ही सच्ची श्रद्धा की सबसे बड़ी पहचान है।





