लखीसराय। एक तरफ बचपन की मासूमियत, दूसरी तरफ पूजा-पाठ और संस्कारों से भरा माहौल... दिन में पूजा-पाठ और रात में पढ़ाई... माता-पिता से दूर रहकर संघर्षों के बीच शिक्षा हासिल करने वाले लखीसराय के दो भाइयों ने आज अपनी अलग पहचान बनाई है। यह कहानी है आचार्य लव-कुश पांडेय की, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद वेद, शास्त्र, पुराण और ज्योतिष का अध्ययन कर धार्मिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। 1 जनवरी 1997 को लखीसराय जिले के बड़हिया प्रखंड के टाल शर्मा में जन्मे लव-कुश पांडेय का बचपन धार्मिक वातावरण में बीता। माता जयंती देवी और पिता श्री दिनानाथ पांडेय पूजा-पाठ से जुड़े रहे। घर का माहौल ही ऐसा था कि बचपन से ही दोनों भाइयों का जुड़ाव धर्म और आध्यात्म से होता चला गया।

आचार्य लव कुश पांडेय - बचपन की तस्वीर
आचार्य लव कुश पांडेय - बचपन की तस्वीर फोटो: लखीसराय लाइव
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सिकंदरा के जगदंबा मंदिर से शुरू हुआ धर्म से जुड़ाव

लव-कुश पांडेय बताते हैं कि बचपन की एक घटना ने उनके जीवन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सिकंदरा के जगदंबा मंदिर में हनुमान जी की सेवा करना और आरती दिखाना उनके लिए सिर्फ पूजा का हिस्सा नहीं था, बल्कि यहीं से धर्म के प्रति उनका गहरा जुड़ाव शुरू हुआ। सिकंदरा ही उनका ननिहाल भी है। प्रारंभिक शिक्षा भी उन्होंने यहीं से हासिल की। नाना के साथ पूजा-पाठ में शामिल होना और उनके साथ इलाके के घरों में धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जाना धीरे-धीरे उनके जीवन का हिस्सा बन गया।

आचार्य लव कुश पांडेय
आचार्य लव कुश पांडेय फोटो: लखीसराय लाइव

जुड़वां भाई, एक लक्ष्य और एक साथ संघर्ष

लव और कुश के रिश्ते की सबसे खास बात सिर्फ यह नहीं कि दोनों जुड़वां हैं, बल्कि यह है कि बचपन से ही दोनों ने जीवन का लक्ष्य भी लगभग एक ही रखा। एक साथ पढ़ाई, एक साथ पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में एक-दूसरे का सहयोग- यही उनके जीवन की पहचान बनती गई।

बड़े भाई लव, छोटे भाई कुश... बचपन से आज तक कायम है प्रेम

दोनों भाइयों में लव बड़े और कुश छोटे हैं। बचपन से ही दोनों के बीच गहरा प्रेम रहा है, जो आज भी कायम है। दोनों भाइयों ने छोटे-मोटे कर्मकांड से अपने धार्मिक सफर की शुरुआत की और एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाकर आगे बढ़ते रहे। संघर्ष के दिनों में भी दोनों भाइयों ने घर से बहुत कम पैसे लिए। सीमित संसाधनों के बीच पढ़ाई और पूजा-पाठ दोनों साथ-साथ चलते रहे।

आचार्य लव कुश पांडेय
आचार्य लव कुश पांडेय फोटो: लखीसराय लाइव

दिन में पूजा-पाठ, रात में पढ़ाई

लव-कुश पांडेय की जिंदगी का सबसे कठिन दौर पढ़ाई का समय रहा। माता-पिता से दूर रहकर शिक्षा हासिल करना आसान नहीं था। दिन में पूजा-पाठ और रात में पढ़ाई - यही उनकी दिनचर्या बन गई थी। स्कूल के दिनों से ही दोनों भाइयों की रुचि संस्कृत में थी। बचपन से धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने की जिज्ञासा रही। नित्य क्रम पूजा प्रकाश जैसी पुस्तकों से धार्मिक विषयों में रुचि और गहरी होती गई। संघर्षों के बावजूद दोनों भाइयों ने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उनका मानना था कि जीवन में कुछ अलग करना है तो सीमित संसाधनों को चुनौती मानकर मेहनत करनी होगी।

माता-पिता बने पहले गुरु

आचार्य लव-कुश पांडेय अपने जीवन के पहले गुरु के रूप में अपने माता-पिता जयंती देवी और दिनानाथ पांडेय को मानते हैं। माता-पिता से मिले संस्कारों ने ही उन्हें धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। परिवार ने भी उनके फैसले का पूरा समर्थन किया। माता-पिता की परिस्थितियों को देखते हुए दोनों भाइयों ने धार्मिक मार्ग को ही अपना जीवन बनाने का निर्णय लिया।

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काशी पहुंचकर शुरू हुआ शास्त्रों का गहन अध्ययन

सनातन धर्म के गहन अध्ययन की शुरुआत काशी से हुई। बाबा विश्वनाथ की नगरी में रहकर दोनों भाइयों ने आचार्य बनने के लिए शिक्षा प्राप्त की। यह सफर आसान नहीं था। उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद, वेद, शास्त्र, पुराण और ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन किया। आचार्य की उपाधि हासिल करने की प्रक्रिया भी संघर्षों से भरी रही, लेकिन लक्ष्य स्पष्ट था—इसी वजह से कठिनाइयां रास्ते की बाधा नहीं बन सकीं। आचार्य लव-कुश पांडेय कहते हैं कि उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि उनका लक्ष्य हासिल नहीं होगा। सामने लक्ष्य था और लगातार मेहनत करते रहे।

बिहारशरीफ से शुरू हुआ कथा और प्रवचन का सफर

पहली बार कथा और प्रवचन करने का अवसर बिहारशरीफ में मिला। वहां माता की प्राण-प्रतिष्ठा के धार्मिक आयोजन से उनके सार्वजनिक धार्मिक सेवा के सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद धीरे-धीरे उनके धार्मिक कार्यों का दायरा बढ़ता गया। आज बिहार और झारखंड के अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर वे धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, कथा और अन्य धार्मिक कार्यों से जुड़े हुए हैं।

117 यज्ञ करा चुके हैं आचार्य लव-कुश पांडेय

धार्मिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आचार्य लव-कुश पांडेय के नेतृत्व में अब तक 117 यज्ञ संपन्न हो चुके हैं। उनके लिए कोई एक धार्मिक आयोजन सबसे यादगार नहीं है। उनका कहना है कि हर धार्मिक कार्य उनके जीवन का अलग अनुभव रहा है और प्रत्येक आयोजन से कुछ नया सीखने को मिला।

संघर्ष के दिनों की याद दिलाता है लोगों का प्यार

आज जब लोग उन्हें सम्मान और स्नेह देते हैं तो उन्हें अपने संघर्ष के दिन याद आ जाते हैं। वे मानते हैं कि लोगों का प्रेम और सम्मान उनके लिए बेहद सुखद अनुभूति है। जिस सफर की शुरुआत सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों से हुई थी, आज वही सफर उन्हें लोगों के बीच धार्मिक पहचान दिला रहा है।

सोशल मीडिया को धर्म प्रचार का बेहतर माध्यम मानते हैं

आधुनिक दौर में सोशल मीडिया को आचार्य लव-कुश पांडेय धर्म प्रचार का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं। उनका कहना है कि तकनीक की मदद से दूर रहकर भी भक्तों तक पहुंच बनाई जा सकती है। उनके मुताबिक सोशल मीडिया के जरिए धार्मिक संदेश और धार्मिक गतिविधियों की जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जा सकती है।

सुबह संध्या वंदन, गायत्री और माता की उपासना

आचार्य लव-कुश पांडेय की दिनचर्या भी धार्मिक गतिविधियों से जुड़ी है। सुबह संध्या वंदन, गायत्री उपासना और माता की आराधना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। खाली समय में वे वेदों का अध्ययन करना और धर्म से जुड़े कार्यों में समय देना पसंद करते हैं।

युवाओं को संदेश—निष्ठा, परिश्रम और धर्म से जुड़ाव जरूरी

आज की युवा पीढ़ी के लिए आचार्य लव-कुश पांडेय का संदेश है कि जीवन में सफलता के लिए सच्ची निष्ठा, परिश्रम और धर्म के प्रति लगाव जरूरी है। उनका मानना है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत जारी रहे तो सफलता जरूर मिलती है।

माता-पिता की सफलता ही सबसे बड़ी उपलब्धि

जब उनसे पूछा गया कि माता-पिता के लिए उन्होंने सबसे बड़ा क्या किया, तो उनका जवाब बेहद भावुक था। उनका कहना है कि दोनों भाइयों की सफलता ही उनके माता-पिता के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। वे अपने माता-पिता को देवताओं से भी ज्यादा प्रेम करते हैं और मानते हैं कि आज वे जो कुछ भी हैं, उसमें माता-पिता के संस्कारों की सबसे बड़ी भूमिका है।

आचार्य लव कुश पांडेय
आचार्य लव कुश पांडेय फोटो: लखीसराय लाइव

अगर आचार्य नहीं होते तो भी धर्म से ही जुड़े रहते

आचार्य लव-कुश पांडेय से जब पूछा गया कि अगर वे आचार्य नहीं बनते तो क्या करते, तो उनका जवाब भी उनकी सोच को साफ कर देता है। उनका कहना है कि अगर वे आचार्य नहीं भी होते, तब भी धर्म से जुड़े रहते और धार्मिक कार्य करते। यानी बचपन में सिकंदरा के जगदंबा मंदिर में हनुमान जी की सेवा से शुरू हुआ यह सफर आज वेद, शास्त्र, पुराण, ज्योतिष, यज्ञ और धार्मिक सेवा तक पहुंच चुका है। लव-कुश पांडेय की कहानी सिर्फ दो भाइयों के आचार्य बनने की कहानी नहीं, बल्कि सीमित संसाधनों के बीच लक्ष्य, संस्कार, मेहनत और विश्वास के सहारे अपनी पहचान बनाने की कहानी है।