लखीसराय: बिहार सरकार जहां सरकारी अस्पतालों में पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कर रही है, वहीं लखीसराय जिले के बड़हिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से सामने आया एक आदेश पूरे स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अस्पताल प्रशासन ने परिसर में सूचना चस्पा कर साफ कर दिया है कि प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना अस्पताल परिसर में किसी भी प्रकार की वीडियोग्राफी पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगी। बीते 21 जुलाई को "बड़हिया CHC में चिकित्सकों की कमी, लापरवाही और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई। इसी दिन प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. सत्येंद्र नारायण मोहन पासवान के हस्ताक्षर से यह नया आदेश भी जारी कर अस्पताल परिसर में चस्पा कर दिया गया। ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या अस्पताल की बदहाल व्यवस्था उजागर होने के बाद मीडिया की रिपोर्टिंग पर अप्रत्यक्ष अंकुश लगाने की कोशिश की गई?

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यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने हाल ही में स्पष्ट कहा था कि सरकारी अस्पतालों में पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने से कोई नहीं रोक सकता। मीडिया को रिपोर्टिंग का पूरा अधिकार है और अस्पताल प्रशासन किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करेगा। इसके बावजूद बड़हिया CHC में जारी यह आदेश सीधे-सीधे मंत्री के निर्देशों को चुनौती देता नजर आ रहा है।

डीएम के एक्शन के बाद भी नहीं सुधरी व्यवस्था

बड़हिया CHC पिछले कई दिनों से लगातार सुर्खियों में है। 17 और 18 जुलाई की रात डीएम शैलेंद्र कुमार ने अस्पताल का औचक निरीक्षण किया था। निरीक्षण में करोड़ों रुपये की लागत से बना नया अस्पताल भवन बंद मिला, कई चिकित्सक ड्यूटी से गायब पाए गए और अस्पताल की कार्यप्रणाली में गंभीर अनियमितताएं उजागर हुई थीं। इसके बाद डीएम ने अनुपस्थित चिकित्सकों से स्पष्टीकरण मांगने, अंतिम निर्णय तक वेतन रोकने, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई शुरू करने, अस्पताल में CCTV कैमरे लगाने, बायोमेट्रिक उपस्थिति लागू करने, दवा वितरण केंद्र शुरू कराने, ड्यूटी रोस्टर सार्वजनिक करने और नियमित निगरानी सुनिश्चित करने जैसे सख्त निर्देश दिए थे। लेकिन डीएम की कार्रवाई के कुछ ही दिनों बाद अस्पताल प्रशासन का यह नया आदेश यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या व्यवस्था सुधारने की बजाय सच्चाई दिखाने वालों पर ही रोक लगाने की कोशिश हो रही है?

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फोटो: लखीसराय लाइव

मीडिया पर रोक, किस बात का डर?

सरकारी अस्पताल जनता के टैक्स के पैसे से चलते हैं। ऐसे में वहां की व्यवस्थाओं पर जनता और मीडिया दोनों की निगरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। यदि अस्पताल प्रशासन रिपोर्टिंग और वीडियोग्राफी के लिए अनुमति को अनिवार्य बना देता है, तो यह व्यवस्था पारदर्शिता की बजाय पर्दादारी की ओर बढ़ती दिखाई देती है। पत्रकारों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि सरकारी अस्पतालों में मीडिया की स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर इस प्रकार की शर्तें लगाई जाएंगी, तो जनता तक अस्पतालों की वास्तविक तस्वीर पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा। इससे जवाबदेही भी प्रभावित होगी।

बड़हिया अस्पताल की हकीकत का पोल खोलता यह वीडियो

अब सबकी निगाहें स्वास्थ्य विभाग पर

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य मंत्री के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी करने वाले इस आदेश पर कार्रवाई होगी? क्या जिला प्रशासन इस आदेश की समीक्षा करेगा? क्या अस्पताल प्रशासन को इसे वापस लेने या संशोधित करने का निर्देश दिया जाएगा? फिलहाल इतना तय है कि यह मामला केवल एक सूचना-पत्र का नहीं रह गया है। यह अब सरकारी अस्पतालों में पारदर्शिता, मीडिया की स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और जनता के सूचना के अधिकार से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में ठोस कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाता है।